Class 12 Hindi

Chapter 13 — Pahalwan Ki Dholak

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Overview

Summary

यह NCERT Class 12 Hindi Aroh Pahalwan Ki Dholak (पहलवान की ढोलक) फ़णीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखित आंचलिक कहानी है, जो लुट्टन सिंह पहलवान के संघर्षपूर्ण जीवन और महामारी-पीड़ित गाँव में उनकी ढोलक की संजीवनी शक्ति का मार्मिक चित्रण करती है।

मलेरिया और हैजे से तड़पते गाँव की अँधेरी रात में केवल लुट्टन सिंह पहलवान की ढोलक की आवाज गूँजती है। नौ वर्ष में अनाथ लुट्टन को विधवा सास ने पाला। श्यामनगर के दंगल में 'शेर के बच्चे' चाँद सिंह को पछाड़कर वे राजा श्यामानंद के राज-पहलवान बने। पंद्रह वर्ष अजेय रहने के बाद वृद्ध राजा के निधन पर नए राजकुमार ने दरबार से निकाल दिया। गाँव लौटे लुट्टन ने महामारी में दोनों पुत्र खोए, फिर भी रात-भर ढोलक बजाकर गाँव को जीने की ताकत देते रहे। अंत में उनकी लाश 'चित' मिली।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01लेखक फ़णीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च, 1921 को औराही हिगना (जिला पूर्णिया, अब अररिया), बिहार में हुआ; निधन 11 अप्रैल, 1977 को पटना में।
  2. 02विधा: आंचलिक कहानी। रेणु हिंदी साहित्य में 'आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित' हैं; प्रमुख उपन्यास: मैला आँचल, परती परिकथा; कहानी-संग्रह: ठुमरी, अगिनखोर।
  3. 03केंद्रीय भाव: व्यवस्था के बदलने से लोक-कला और लोक-कलाकार का अप्रासंगिक हो जाना; साथ ही यह भाव कि ढोलक की आवाज 'मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी।'
  4. 04मुख्य पात्र: लुट्टन सिंह पहलवान (नौ वर्ष में अनाथ, सास ने पाले), चाँद सिंह उर्फ 'शेर के बच्चे' (पंजाब से आए, बादल सिंह के शिष्य), राजा श्यामानंद (लुट्टन के संरक्षक)।
  5. 05प्रमुख घटनाएँ: दंगल में चाँद सिंह को 'चारों खाने चित' करना → राज-पहलवान बनना → पंद्रह वर्ष अजेय → नए राजकुमार द्वारा निष्कासन → गाँव में महामारी → दोनों बेटों की मृत्यु → स्वयं लुट्टन का अंत।
  6. 06ढोलक की ध्वनियाँ और उनके अर्थ (पाठ में दिए गए): 'चट्-धा, गिड़-धा' = 'आ जा भिड़ जा'; 'चटाक्-चट्-धा' = 'उठाकर पटक दे'; 'चट्-गिड़-धा' = 'मत डरना'; 'धाक-धिना, तिरकट-तिना' = 'दाँव काटो, बाहर हो जा'; 'धिना-धिना, धिक-धिना' = 'चित करो'।
  7. 07कठिन शब्दार्थ: **निस्तब्धता** — गहरी चुप्पी, सन्नाटा (पाठ में 'अंधकार और निस्तब्धता' एक साथ प्रयुक्त); **संजीवनी शक्ति** — जीवन देने वाली शक्ति; **अनावृष्टि** — वर्षा न होना (महामारी से पहले 'पहले अनावृष्टि, फिर अन्न की कमी' वर्णित)।
Questions

Frequently asked questions

01

पहलवान की ढोलक के लेखक कौन हैं?

लेखक फ़णीश्वर नाथ रेणु हैं। उनका जन्म 4 मार्च, 1921 को औराही हिगना, बिहार में और निधन 11 अप्रैल, 1977 को पटना में हुआ।

02

Luttan Singh Pahalwan ka parichay kya hai?

लुट्टन सिंह नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ हो गए थे; विधवा सास ने पाल-पोस कर बड़ा किया। बचपन में गाय चराते, कसरत करते और धीरे-धीरे गाँव के सबसे अच्छे पहलवान बने।

03

'शेर के बच्चे' कौन थे और लुट्टन ने उन्हें कैसे हराया?

'शेर के बच्चे' का असल नाम चाँद सिंह था, जो पंजाब से बादल सिंह के साथ श्यामनगर मेले में आए थे। ढोल की आवाज 'धाक-धिना, तिरकट-तिना' सुनकर लुट्टन ने दाँव काटा, चाँद की गर्दन पकड़ी और उन्हें 'चारों खाने चित' कर दिया।

04

लुट्टन पहलवान का गुरु कौन था?

पाठ में लुट्टन स्वयं कहते हैं — 'मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है, समझे! ढोल की आवाज के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ।'

05

ढोलक की आवाज का गाँव पर क्या असर होता था?

पाठ के अनुसार, 'गाँव के अर्द्धमृत, औषधि-उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी।' बूढ़े-बच्चे-जवानों की आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता और स्नायुओं में बिजली दौड़ जाती थी।

06

लुट्टन को राज-दरबार से क्यों निकाला गया?

वृद्ध राजा श्यामानंद के स्वर्गवास के बाद नए राजकुमार विलायत से आए। पहलवान और उनके दोनों बेटों का दैनिक भोजन-व्यय सुनकर राजकुमार ने 'टैरिबुल!' कहा और पहलवान को 'साफ जवाब मिल गया कि राज-दरबार में उसकी आवश्यकता नहीं।'

07

महामारी में लुट्टन के बेटों ने मरते समय क्या माँगा?

पाठ में आया है — 'बाबा! उठा पटक दो वाला ताल बजाओ!' इस पर पहलवान सारी रात 'चटाक्-चट्-धा, चटाक्-चट्-धा' ढोलक पीटते और बीच-बीच में 'मारो बहादुर!' कहकर उत्साहित करते रहे।

08

Pahalwan Ki Dholak ka ant kya hota hai?

दोनों बेटों की मृत्यु के चार-पाँच दिन बाद एक रात ढोलक की आवाज बंद हो गई। प्रातःकाल शिष्यों ने देखा — 'पहलवान की लाश चित पड़ी है।'

09

लुट्टन पहलवान की अंतिम इच्छा क्या थी?

पाठ में पहलवान ने कहा था — 'जब मैं मर जाऊँ तो चिता पर मुझे चित नहीं, पेट के बल सुलाना। मैं जिंदगी में कभी चित नहीं हुआ। और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजा देना।'

10

रेणु की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?

उपन्यास: मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, जुलूस, कितने चौराहे। कहानी-संग्रह: ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप। संस्मरण: ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध।

11

महामारी के समय गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के बाद का दृश्य कैसा था?

दिन में लोग कराहते-कराहते बाहर निकलकर एक-दूसरे को ढाढ़स देते थे। पर 'सूर्यास्त होते ही जब लोग झोंपड़ियों में घुस जाते तो चूँ भी नहीं करते' — पास में दम तोड़ते बेटे को 'बेटा!' पुकारने की भी हिम्मत माताओं की नहीं होती थी।

12

क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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