Summary
NCERT Class 11 Hindi Antra Torch Bechnewale हरिशंकर परसाई (1922-1995) द्वारा लिखित एक व्यंग्य-रचना है जिसमें 'टॉर्च' के प्रतीक के माध्यम से आस्थाओं के बाजारीकरण और धार्मिक पाखंड पर करारी चोट की गई है।
'टार्च बेचनेवाले' में एक व्यक्ति चौराहों पर 'सूरज छाप' टार्च बेचता है — पहले लोगों को अंधेरे का भय दिखाकर, फिर टार्च खरीदने को उकसाकर। पाँच साल पहले उसने अपने दोस्त के साथ अलग-अलग दिशाओं में जाकर पैसा कमाने का रास्ता खोजने की कसम खाई थी। पाँच साल बाद दोस्त को ढूंढने पर पता चलता है कि वह भव्य 'साधु' बन चुका है और 'साधना मंदिर' की आड़ में लोगों को आत्मा के अंधेरे का डर दिखाकर आध्यात्मिक टार्च बेच रहा है। दोनों के व्यापार में केवल 'कंपनी' का अंतर है — अंत में टार्च बेचनेवाला भी कंपनी बदलकर वही धंधा करने को तैयार हो जाता है।
Key points & formulas
- 01लेखक परिचय: हरिशंकर परसाई (1922-1995) का जन्म जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ; नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.; सन् 1947 से स्वतंत्र लेखन; जबलपुर से 'वसुधा' नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली।
- 02विधा: व्यंग्य — परसाई ने व्यंग्य विधा को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की; उनके व्यंग्य समाज की विसंगतियों और विडंबनाओं पर करारी चोट करते हुए चिंतन और कर्म की प्रेरणा देते हैं।
- 03केंद्रीय भाव: 'टॉर्च' के प्रतीक के माध्यम से आस्थाओं के बाजारीकरण और धार्मिक पाखंड पर प्रहार — चाहे भौतिक टार्च हो या आध्यात्मिक 'ज्योति', दोनों धंधों में पहले अंधेरे का भय और फिर अपनी 'कंपनी का टार्च' बेचने की युक्ति एक जैसी है।
- 04मुख्य पात्र व घटनाएँ: टार्च बेचनेवाला (कथावाचक) 'सूरज छाप' टार्च बेचता था; उसका दोस्त पाँच साल बाद भव्य पुरुष बनकर 'साधना मंदिर' के नाम पर भीड़ को 'आत्मा की ज्योति' जगाने का आह्वान कर रहा था और बँगले में ठाठ-बाट से रह रहा था।
- 05भाषा-शैली: परसाई बोलचाल के शब्दों का सतर्कता से प्रयोग करते हैं; इस रचना में नाटकीय संवाद और व्यंग्यपूर्ण कथन पाठक को झकझोर देते हैं — 'जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है।'
- 06कठिन शब्दार्थ: गुरु गंभीर वाणी = विचारों से पुष्ट वाणी; सर्वग्राही = सबको ग्रहण करनेवाला, सबको समाहित करनेवाला; स्तब्ध = हैरान; आह्वान = पुकारना, बुलाना; शाश्वत = चिरंतन, हमेशा रहनेवाली; सनातन = सदैव रहनेवाला।
- 07प्रमुख रचनाएँ: हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, सदाचार की तावीज, और अंत में (निबंध-संग्रह); वैष्णव की फिसलन, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रद्धा का दौर (व्यंग्य-लेख संग्रह); समग्र साहित्य 'परसाई रचनावली' में छह भागों में प्रकाशित।
Frequently asked questions
01Torch Bechnewale ke lekhak kaun hain?
इस व्यंग्य-रचना के लेखक हरिशंकर परसाई (1922-1995) हैं। उनका जन्म जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था।
02NCERT Class 11 Hindi Antra Torch Bechnewale किस विधा की रचना है?
यह एक व्यंग्य-रचना है। परसाई ने व्यंग्य विधा को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की और समाज की विसंगतियों तथा विडंबनाओं पर करारी चोट की है।
03'सूरज छाप' टार्च बेचने का क्या तरीका था?
टार्च बेचनेवाला चौराहे या मैदान में लोगों को इकट्ठा करता और नाटकीय ढंग से अंधेरे के भय की बात करता — रात को साँप, शेर, रास्ता न दिखना आदि। फिर कहता: 'वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूँ। हमारी सूरज छाप टार्च में वह प्रकाश है, जो अंधकार को दूर भगा देता है।'
04पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात किन परिस्थितियों में हुई?
टार्च बेचनेवाले ने दोस्त को तय जगह पर न पाकर उसे ढूंढने निकला। एक शहर के मैदान में उसने देखा कि हजारों श्रोताओं के बीच मंच पर एक भव्य पुरुष प्रवचन दे रहा है — रेशमी वस्त्र, सँवारी हुई लंबी दाढ़ी और लहराते लंबे केश — वही उसका दोस्त था।
05भव्य पुरुष 'साधना मंदिर' के नाम पर क्या बेच रहा था?
भव्य पुरुष लोगों को आत्मा और अंतर के अंधकार का भय दिखाता था, फिर 'साधना मंदिर' में आकर 'अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाने' का आह्वान करता था। यह भी एक प्रकार का 'टार्च' बेचना था — केवल कंपनी 'सनातन' थी।
06दोनों दोस्तों के प्रवचन में क्या समानता थी?
टार्च बेचनेवाले ने स्वयं दोस्त को बताया: 'जो बातें मैं कहता हूँ, वही तू कह रहा था। मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है।' दोनों पहले अंधेरे का डर दिखाते थे, फिर अपनी 'कंपनी का टार्च' बेचते थे।
07दोस्त ने अपनी कंपनी के बारे में क्या कहा?
दोस्त ने स्वीकार किया: 'तेरी बात ठीक ही है। मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है।' उसने यह भी कहा कि उस टार्च की 'कोई दुकान बाजार में नहीं है, वह बहुत सूक्ष्म है, मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है।'
08टार्च बेचनेवाले ने 'सूरज छाप' टार्च की पेटी नदी में क्यों फेंकी?
दोस्त के बँगले पर दो दिन रहकर उसने 'नया काम' समझ लिया। तीसरे दिन उसने 'सूरज छाप' टार्च की पेटी नदी में फेंककर नया धंधा शुरू कर दिया — कंपनी बदलकर 'भीतर की ज्योति' का व्यापार।
09इस व्यंग्य में 'टार्च' किसका प्रतीक है?
पाठ के लेखक-परिचय में ही स्पष्ट है: 'टॉर्च के प्रतीक के माध्यम से परसाई ने आस्थाओं के बाजारीकरण और धार्मिक पाखंड पर प्रहार किया है।' भौतिक टार्च और आध्यात्मिक 'ज्योति' — दोनों व्यापार के एक जैसे औजार हैं।
10Harishankhar Parasai ka janm kahan hua tha?
हरिशंकर परसाई का जन्म जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और सन् 1947 से स्वतंत्र लेखन में जुट गए।
11'धंधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा, बस कंपनी बदल रहा हूँ' — इसका क्या तात्पर्य है?
यह इस व्यंग्य का केंद्रीय निष्कर्ष है — भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के 'प्रकाश विक्रेता' एक ही युक्ति अपनाते हैं: पहले अंधेरे का भय, फिर अपनी 'कंपनी का टार्च'। केवल शब्दावली और वेशभूषा अलग होती है, मूल व्यापार एक ही है।
12परसाई की भाषा-शैली की क्या विशेषता है?
परसाई को भाषा-प्रयोग में असाधारण कुशलता प्राप्त थी। वे प्रायः बोलचाल के शब्दों का प्रयोग सतर्कता से करते थे। कौन-सा शब्द कब और कैसा प्रभाव पैदा करेगा, इसे वे बखूबी जानते थे।
13क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?
हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।
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