Class 7 Sanskrit

Chapter 2 — नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्

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Overview

Summary

Nityam Pibamah Subhashitarasam is the second chapter of Class 7 Sanskrit textbook Deepakam, presenting nine Sanskrit subhashitas (wise sayings) with पदच्छेद, अन्वय and भावार्थ. यह पाठ नौ संस्कृत सुभाषितों के माध्यम से जीवन के नैतिक और सामाजिक मूल्य सिखाता है।

इस पाठ में एक विद्यालय के संवाद के माध्यम से सुभाषितों का परिचय दिया गया है। गुरुजी बताते हैं कि श्रेष्ठ जनों के सुवचन ही सुभाषित हैं, जो मानवीय मूल्यों का विकास करते हैं। पाठ में नौ सुभाषित दिए गए हैं — पाँच वकारों से सम्मान, छः दोषों का त्याग, शुद्धि के उपाय, भारतवर्ष का परिचय, निरंतर अभ्यास की महिमा, पठन-लेखन से बुद्धिविकास, मधुर वचन, परिश्रम की महत्ता और परोपकार। साथ में तृतीयाविभक्ति के शब्दरूप और अमरकोश के पर्यायपद भी दिए गए हैं।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01विषय: पाठ एक संवाद से आरंभ होता है — छात्र सुशीला, रमा और सुरेश विद्यालय की भित्ति पर लिखे सुभाषित का अर्थ जानना चाहते हैं; गुरुजी सुभाषितों की परिभाषा और उनके पठन का लाभ समझाते हैं।
  2. 02केंद्रीय शिक्षा: नित्य सुभाषितों का पठन मनुष्य का नैतिक और सामाजिक विकास करता है; यह बताता है कि क्या करणीय है और क्या अकरणीय।
  3. 03प्रमुख श्लोक: "आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।।" — आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है; परिश्रम ही सच्चा मित्र है।
  4. 04नौ सुभाषितों के विषय: (१) पाँच वकारों से सम्मान, (२) छः दोषों का त्याग, (३) शरीर-मन-बुद्धि की शुद्धि, (४) भारतवर्ष का भौगोलिक परिचय, (५) बूँद-बूँद से घड़ा भरने का उदाहरण, (६) पठन-लेखन से बुद्धिविकास, (७) मधुर वचन, (८) आलस्य बनाम परिश्रम, (९) व्यास के वचनद्वय।
  5. 05कठिन शब्द-अर्थ: दीर्घसूत्रता = कार्य को आगे टालने की प्रवृत्ति; तन्द्रा = कर्महीनता; भूतिम् = वैभव/ऐश्वर्य; भूतात्मा = जीव/प्राणी।
  6. 06व्याकरण: 'अत्र इदम् अवधेयम्' खंड में तृतीयाविभक्ति के शब्दरूप दिए गए हैं — पुल्लिंग (छात्र, शिक्षक), स्त्रीलिंग (विद्या, छात्रा) और नपुंसकलिंग (सत्य, ज्ञान, किम्) के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूप।
  7. 07योग्यताविस्तर: अमरकोश से वपुः, नराः, भूतिः, मनः, बुद्धिः, धनम्, पण्डितः, दिवाकरः, जन्तुः और रिपुः के पर्यायपद दिए गए हैं।
Questions

Frequently asked questions

01

nityam pibamah subhashitarasam paath ka arth kya hai?

"नित्यं पिबाम: सुभाषितरसम्" का अर्थ है — हम नित्य (प्रतिदिन) सुभाषितों का रस पियें। यह पाठ हमें प्रतिदिन श्रेष्ठ सुवचनों का अध्ययन करने की प्रेरणा देता है।

02

सुभाषित किसे कहते हैं?

श्रेष्ठ जनों द्वारा कहे गए वे सुवचन जो मानवीय मूल्यों का विकास करते हैं, सुभाषित कहलाते हैं। पाठ में गुरुजी कहते हैं — "मानवानां विविधमूल्यानां विकासाय श्रेष्ठजनैः उक्तानि सुवचनानि एव सुभाषितानि।"

03

इस पाठ में कितने सुभाषित हैं?

इस पाठ में नौ (9) सुभाषित हैं।

04

पाँच वकार कौन-कौन से हैं?

वस्त्र, वपुः (शरीर), वाक् (वचन), विद्या और विनय — इन पाँच वकारों से युक्त मनुष्य को समाज में सम्मान मिलता है।

05

मनुष्य को कौन से छः दोष त्यागने चाहिए?

ऐश्वर्य की इच्छा रखने वाले मनुष्य को निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता — ये छः दोष त्यागने चाहिए।

06

"अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति" श्लोक में किन-किन चीज़ों की शुद्धि बताई गई है?

इस श्लोक में चार प्रकार की शुद्धि बताई गई है — जल से शरीर की, सत्य से मन की, विद्या और तप से जीवात्मा (भूतात्मा) की, और ज्ञान से बुद्धि की।

07

घड़े और जलबिन्दु के उदाहरण से क्या शिक्षा मिलती है?

जैसे जल की बूँदें निरंतर गिरने से खाली घड़ा भर जाता है, उसी प्रकार जीवन में निरंतर अभ्यास से साधारण मनुष्य भी सभी प्रकार का ज्ञान, धर्म और धन प्राप्त कर सकता है।

08

"आलस्यं हि मनुष्याणां" श्लोक का भावार्थ क्या है?

आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है। उद्यम (परिश्रम) के समान कोई मित्र नहीं है — जो परिश्रम करता है वह कभी दुखी नहीं होता।

09

व्यास के वचनद्वय में क्या कहा गया है?

महर्षि वेदव्यास के अट्ठारह पुराणों का सार दो वाक्यों में है — दूसरों का उपकार करने से पुण्य होता है और दूसरों को पीड़ा देने से पाप होता है।

10

पाठ में मधुर वचन के बारे में क्या कहा गया है?

"प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः" — मधुर वाणी से सभी प्राणी संतुष्ट होते हैं। अतः सदा मधुर वचन बोलना चाहिए; वचन देने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।

11

तृतीयाविभक्ति के रूप किन शब्दों के दिए गए हैं?

पाठ में तृतीयाविभक्ति के रूप इन शब्दों के दिए गए हैं — पुल्लिंग में छात्र और शिक्षक, स्त्रीलिंग में विद्या और छात्रा, नपुंसकलिंग में सत्य, ज्ञान और किम् (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन)।

12

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13

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