Summary
Hitam Manohari ca Durlabham Vacah (पाठ 8, दीपकम्, कक्षा 7) संस्कृत साहित्य की दस प्रसिद्ध सूक्तियों का संग्रह है। यह पाठ विद्यार्थियों को जीवन-मूल्यों से परिचित कराता है और सिखाता है कि हितकारक तथा मनोहारी — दोनों गुणों वाला वचन अत्यंत दुर्लभ होता है।
यह पाठ दस संस्कृत सूक्तियों का संग्रह है जो अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् और किरातार्जुनीयम् जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थों से ली गई हैं। ये सूक्तियाँ धरती को माता मानने, गुणवान बनने, शरीर की रक्षा करने, क्षण-क्षण विद्या अर्जन करने, सुख की लालसा छोड़ने, चरित्र को सर्वश्रेष्ठ आभूषण मानने तथा हितकारक एवं मधुर वचन बोलने की शिक्षा देती हैं।
Key points & formulas
- 01विषय: अथर्ववेद, कुमारसम्भवम्, पञ्चतन्त्रम्, उत्तररामचरितम्, नीतिशतकम् और किरातार्जुनीयम् से संकलित दस जीवनोपयोगी सूक्तियाँ।
- 02केंद्रीय शिक्षा: वह वचन दुर्लभ है जो एक साथ हितकारक भी हो और मनोहारी भी — 'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः'।
- 03प्रमुख सूक्तियाँ: 'शीलं परं भूषणम्' (चरित्र सर्वश्रेष्ठ आभूषण है); 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' (शरीर ही धर्म का पहला साधन है); 'यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्' (जो कर्मशील है वही वास्तविक विद्वान है)।
- 04गुण और सम्मान: 'गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः' — गुणी व्यक्ति का सम्मान लिंग और आयु से नहीं, केवल गुणों से होता है।
- 05विद्यार्जन की विधि: 'क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्' — प्रत्येक पल का उपयोग विद्या के लिए और प्रत्येक कण का संग्रह धन के लिए करना चाहिए।
- 06कठिन शब्द — अर्थ: मृग्यते = ढूँढ़ा जाता है; क्षणशः = प्रत्येक पल में; शीलम् = चरित्र।
- 07व्याकरण (योग्यताविस्तार): म्-कार लेखन का नियम — व्यञ्जन से पहले म् के स्थान पर अनुस्वार (◌ं) लिखते हैं; स्वर से पहले म् ही लिखते हैं।
Frequently asked questions
01'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः' का अर्थ क्या है?
इस सूक्ति का अर्थ है कि जो वचन हितकारक भी हो और मनोरम भी हो — ऐसा वचन दुर्लभ होता है। कोई कठोरता से हित की बात कहता है, कोई मीठे शब्दों में अहित की — दोनों गुण एक साथ रखने वाला वचन बहुत कम मिलता है।
02इस पाठ में कुल कितनी सूक्तियाँ हैं और वे किन ग्रन्थों से ली गई हैं?
इस पाठ में दस सूक्तियाँ हैं। ये अथर्ववेद, कुमारसम्भवम् (कालिदास), पञ्चतन्त्रम् (विष्णुशर्मा), उत्तररामचरितम् (भवभूति), नीतिशतकम् (भर्तृहरि) और किरातार्जुनीयम् (भारवि) ग्रन्थों से संकलित हैं।
03'शीलं परं भूषणम्' का अर्थ और शिक्षा क्या है?
इसका अर्थ है: चरित्र ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण है। पाठ के अनुसार मनुष्य का आचरण ही उसका सबसे बड़ा गहना है; सदाचार के बिना अन्य गुण निरर्थक हो जाते हैं।
04'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है: शरीर ही निश्चित रूप से धर्म का पहला साधन है। यदि शरीर स्वस्थ है तो हम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं; इसीलिए शरीर की रक्षा अनिवार्य है।
05'यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्' का क्या भाव है?
जो व्यक्ति अर्जित ज्ञान को जीवन में आचरण और व्यवहार में प्रयोग करता है, वही वास्तविक विद्वान है। केवल पढ़ लेने से नहीं, कर्म से ज्ञान सार्थक होता है — 'ज्ञानं भारः क्रियां विना'।
06'सुखार्थिनः कुतो विद्या, कुतो विद्यार्थिनः सुखम्' का अर्थ क्या है?
जो सदा सुख चाहता है और परिश्रम नहीं करता, वह विद्या कैसे प्राप्त कर सकता है? और जो विद्यार्जन में लगा है वह सुख कहाँ से पाएगा? अर्थात् विद्या और आलसी सुख एक साथ नहीं रह सकते।
07पाठ में 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' का क्या भाव है?
इसका भाव है: भूमि हमारी माता है और हम सब पृथ्वी के पुत्र-पुत्रियाँ हैं। पृथ्वी माता की तरह हमारा लालन-पालन करती है, इसलिए वह सदा पूजनीय है।
08'न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत्' का क्या अर्थ है?
रत्न (हीरा-माणिक आदि) स्वयं ग्राहक को नहीं ढूँढ़ते; ग्राहक ही उन्हें ढूँढ़ते हैं। उसी प्रकार यदि हममें गुण हों तो गुणज्ञ लोग स्वयं हमें ढूँढ़ते आएँगे।
09पाठ में 'मा ब्रूहि दीनं वचः' की शिक्षा क्या है?
इसका अर्थ है: दीन (दयनीय) वचन मत बोलो। स्वाभिमानी व्यक्ति किसी के भी सामने साहाय्य की याचना नहीं करता।
10पाठ में 'गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः' का क्या भाव है?
गुणी व्यक्ति में उसके गुण ही पूजनीय होते हैं, न उसका लिंग और न उसकी आयु। पुरुष हो या स्त्री, बालक हो या वृद्ध — गुणवान व्यक्ति सदा सम्मान का पात्र होता है।
11What is the moral (sandesh) of the chapter Hitam Manohari ca Durlabham Vacah?
इस पाठ की मुख्य शिक्षा यह है कि सच्चा ज्ञान कर्म में प्रकट होता है, चरित्र सर्वश्रेष्ठ आभूषण है, और जो वचन एक साथ हितकारक और मधुर हो — वह बहुत दुर्लभ है।
12पाठ में शब्द 'सूक्तिः' का अर्थ क्या बताया गया है?
पाठ में आचार्य बताते हैं कि 'सूक्तिः' का अर्थ 'सुन्दरं वचनम्' (सुंदर वचन) है। सूक्ति = सु + उक्तिः। इनमें जीवनमूल्य निहित होते हैं और ये हमें जीवन में उन्नति के लिए प्रेरित करती हैं।
13क्षणशः और कणशः का हिंदी अर्थ क्या है?
पाठ के शब्दार्थ के अनुसार: क्षणशः = प्रत्येक पल में; कणशः = प्रत्येक कण में। सूक्ति का भाव है कि विद्या क्षण-क्षण में और धन कण-कण जोड़कर अर्जित करना चाहिए।
14क्या यह अध्याय की PDF मुफ़्त है?
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