Class 7 Sanskrit

Chapter 6 — क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम्

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Overview

Summary

Kridama Vayam Shlokantyaksharim (Class 7 Sanskrit, Deepakam, Chapter 6) is a dialogue-based chapter in which students play a Sanskrit shloka-antakshari game — बारिश के कारण घर में रहकर दीपिका, भारती और उनकी सखियाँ दो दलों में बँटकर विद्या की महिमा पर आधारित दस सुभाषित श्लोकों की अन्त्याक्षरी खेलती हैं।

इस पाठ में वर्षा के कारण बाहर न जा पाने पर दीपिका, भारती और उनकी सखियाँ घर में 'श्लोकान्त्याक्षरी' खेलने का निर्णय लेती हैं। दो दल बनाए जाते हैं — 'ज्ञानमाला' और 'रत्नमाला'। एक दल का सदस्य श्लोक गाता है और उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन वर्ण से दूसरे दल का सदस्य नया श्लोक गाता है। इस क्रम में प्रस्तुत दसों श्लोक विद्या की श्रेष्ठता का वर्णन करते हैं। पाठ के अंत में 'विद्या' शब्द का सम्पूर्ण शब्दरूप भी दिया गया है।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01पाठ का विषय: यह पाठ एक संवाद और खेल पर आधारित है जिसमें छात्राएँ वर्षा के दिन संस्कृत श्लोकों की अन्त्याक्षरी खेलती हैं; बाहर जाने की आवश्यकता नहीं — यह घर के भीतर खेली जाने वाली नूतन क्रीडा है।
  2. 02खेल का नियम: दो दल — ज्ञानमाला और रत्नमाला — बनाए जाते हैं; एक दल का सदस्य श्लोक गाता है और उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन वर्ण से दूसरे दल का सदस्य नया श्लोक गाता है, इसी क्रम में खेल चलता रहता है।
  3. 03केंद्रीय शिक्षा: दसों श्लोक विद्या की महत्ता बताते हैं — विद्या मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ आभूषण है, गुप्त धन है, राजसभा में पूजनीय है और विद्याहीन व्यक्ति पशु के समान है।
  4. 04प्रमुख पात्र: दीपिका, भारती और उनकी सखियाँ; दो दल — ज्ञानमाला (प्रथम गण) और रत्नमाला (द्वितीय गण)।
  5. 05मुख्य श्लोक (श्लोक ६, रत्नमाला): विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्‍तं धनं, विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरु: । विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता, विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीन: पशु: ।।
  6. 06कठिन शब्द: किंशुका: = ढाक/टेसू का पेड़ (सुगंधहीन); व्यसनेन = भोग-विलास/बुरी आदत के द्वारा; खल: = दुर्जन/दुष्ट; भारभूता: = भारस्वरूप/बोझ; तत्त्वज्ञानम् = वास्तविक/यथार्थ ज्ञान।
  7. 07व्याकरण: पाठ के योग्यताविस्तर भाग में 'विद्या' शब्द का सम्पूर्ण शब्दरूप दिया गया है — आकारान्त स्त्रीलिंग, प्रथमा से सम्बोधन तक, एकवचन-द्विवचन-बहुवचन तीनों रूपों में।
Questions

Frequently asked questions

01

kridama vayam shlokantyaksharim paath ka arth kya hai?

इस पाठ का अर्थ है — 'हम श्लोकान्त्याक्षरी खेलें।' यह पाठ एक ऐसी अन्त्याक्षरी का वर्णन करता है जिसमें छात्राएँ संस्कृत के सुभाषित श्लोक गाते हुए खेलती हैं।

02

श्लोकान्त्याक्षरी क्रीडा के नियम क्या हैं?

दो दल बनाए जाते हैं। पहले दल का सदस्य एक पद्य (श्लोक) गाता है। उस श्लोक के अन्तिम व्यञ्जन वर्ण से दूसरे दल का सदस्य नया श्लोक गाता है। इसी क्रम से खेल आगे चलता रहता है।

03

इस पाठ में दो दलों के क्या नाम हैं?

दो दलों के नाम हैं — 'ज्ञानमाला' (प्रथम गण) और 'रत्नमाला' (द्वितीय गण)।

04

रूपयौवनसम्पन्ना श्लोक का भावार्थ क्या है?

जिनके पास सुंदर रूप, यौवन और उच्च कुल में जन्म हो, परंतु वे विद्या अर्जित न करें, तो वे सुगंधहीन टेसू (पलाश) के फूलों जैसे हैं — दिखने में सुंदर पर उपयोगहीन। अतः रूप और कुल से भी अधिक विद्या श्रेष्ठ है।

05

काव्यशास्त्रविनोदेन श्लोक में बुद्धिमान और मूर्ख व्यक्ति का समय कैसे बीतता है?

बुद्धिमान लोगों का समय काव्य और शास्त्र के अनुशीलन में बीतता है, जबकि मूर्ख लोगों का समय दुर्व्यसन, सोने और आपस में कलह करने में व्यर्थ होता है।

06

खल (दुर्जन) और साधु (सज्जन) विद्या, धन व शक्ति का उपयोग किस प्रकार करते हैं?

दुर्जन विद्या का उपयोग विवाद के लिए, धन का अभिमान के लिए, और शक्ति का दूसरों को कष्ट देने के लिए करता है। इसके विपरीत सज्जन विद्या का उपयोग ज्ञानवर्धन के लिए, धन का दान के लिए, और शक्ति का दुर्बलों की रक्षा के लिए करता है।

07

शनैः पन्थाः श्लोक में कौन-से पाँच कार्य धीरे-धीरे करने योग्य बताए गए हैं?

पाँच कार्य हैं: पथ पर चलना (पन्थाः), वस्त्र की सिलाई (कन्था), पर्वत-आरोहण (पर्वतलङ्घनम्), विद्या-अर्जन (विद्या) और धन-संग्रह (वित्तम्) — ये सभी शनैः शनैः अर्थात् क्रमशः करने चाहिए।

08

विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् का क्या अर्थ है?

विद्या रूपी धन सर्वश्रेष्ठ है — इसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई-बहनों में बाँटा जाता है, न यह बोझ बनता है; और बाँटने पर यह और बढ़ता है।

09

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं श्लोक में विद्या के कौन-कौन से गुण बताए गए हैं?

इस श्लोक में विद्या को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ सौंदर्य, गुप्त धन, भोग-यश-सुख देने वाली, गुरुओं की गुरु, विदेश में बंधु-जन, परम देवता और राजसभा में पूजनीय बताया गया है। विद्याहीन व्यक्ति पशु के समान है।

10

येषां न विद्या न तपो श्लोक का भावार्थ क्या है?

जिन मनुष्यों के पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म — इनमें से कुछ भी नहीं है, वे इस संसार में भारस्वरूप हैं और मनुष्य के रूप में पशु की भाँति भटकते रहते हैं।

11

'विद्या' शब्द का एकवचन प्रथमाविभक्ति क्या है और बहुवचन क्या है?

प्रथमाविभक्ति में एकवचन — विद्या, द्विवचन — विद्ये, बहुवचन — विद्याः। पाठ में सभी विभक्तियाँ (प्रथमा से सम्बोधन) तीनों वचनों में दी गई हैं।

12

किंशुकाः और व्यसनेन शब्दों के हिंदी अर्थ क्या हैं?

किंशुकाः = ढाक/टेसू का पेड़ (बिना सुगंध के फूलने वाला); व्यसनेन = भोग-विलास या बुरी आदत के द्वारा।

13

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