Class 8 Sanskrit

Chapter 10 — सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)

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Overview

Summary

Sannimitte Varam Tyagah (Ka-Bhag) is Chapter 10 of Class 8 Sanskrit Deepakam, a story from the Hitopadesha about the devoted prince Veeravara. यह कथा वीरवर नामक कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र की स्वामिभक्ति और उचित कारण के लिए त्याग की प्रेरणा देती है।

यह पाठ 'हितोपदेश' नामक संस्कृत कथाग्रन्थ से लिया गया है। शोभावती नगरी के महापराक्रमी राजा शूद्रक की सेवा में वीरवर नामक राजपुत्र अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री के साथ आजीविका के लिए आता है। मन्त्री की सलाह पर परीक्षा के बाद उसे नियुक्त किया जाता है। वह प्रतिदिन अपना वेतन देवताओं, दरिद्रों और परिवार में बाँटकर दिन-रात राजद्वार पर सेवा करता है। एक अँधेरी रात में राजा को करुण क्रन्दन सुनाई देता है। वीरवर उसका पीछा करता है और नगर के बाहर राजलक्ष्मी से मिलता है, जो बताती हैं कि राजा तीन दिन में मृत्यु को प्राप्त होगा — जब तक वीरवर अपनी सर्वाधिक प्रिय वस्तु का त्याग न करे।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01यह पाठ 'हितोपदेश' नामक प्रसिद्ध संस्कृत कथाग्रन्थ से लिया गया है, जिसमें कथाओं के माध्यम से जीवन के उपदेश दिए जाते हैं।
  2. 02प्रमुख पात्र: वीरवर (कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र-नायक), राजा शूद्रक (महापराक्रमी, नानाशास्त्रवित्, पूतचरित्र), वेदरता (वीरवर की पत्नी), शक्तिधर (पुत्र), वीरवती (पुत्री), राजलक्ष्मी, और मन्त्री।
  3. 03केंद्रीय शिक्षा: 'सन्निमित्ते वरं त्यागः' — उचित और अच्छे कारण के लिए त्याग करना श्रेष्ठ है; स्वामिभक्ति और राष्ट्र-समर्पण प्रेरणीय हैं।
  4. 04वीरवर अपना वेतन (सुवर्णशतचतुष्टयम् — प्रतिदिन चार सौ स्वर्णमुद्राएँ) तीन भागों में बाँटता है: आधा देवताओं को, शेष का आधा दरिद्रों को, और बाकी पत्नी को।
  5. 05प्रमुख कठिन शब्द और अर्थ: महीपतिः = राजा; अहर्निशम् = दिन-रात; पञ्चत्वम् = मृत्यु; दुःसाध्या = कठिनाई से पालन करने योग्य; सहासवदनेन = हँसते हुए मुख से।
  6. 06व्याकरण (अत्र इदम् अवधेयम्): पाठ में (१) संस्कृत का मुक्त पदक्रम (वाक्यान्वयः) — शब्दों को किसी भी क्रम में रखने की विशेषता, और (२) भूतकाल के तीन रूप — लङ्-लकार, क्तवतु्-प्रत्यय, तथा क्त-प्रत्यय — उदाहरण सहित समझाए गए हैं।
  7. 07योग्यताविस्तरः में जीमूतवाहन की कथा दी गई है जो परोपकार के लिए स्वयं का बलिदान करने का आदर्श प्रस्तुत करती है; साथ ही यजुर्वेद, पञ्चतन्त्र और वाल्मीकि-रामायण से कर्म-विषयक श्लोक भी हैं।
Questions

Frequently asked questions

01

sannimitte varam tyagah ka arth kya hai?

'सन्निमित्ते वरं त्यागः' का अर्थ है — अच्छे या उचित कारण (निमित्त) के लिए त्याग करना सर्वश्रेष्ठ है। यही इस पाठ का केंद्रीय संदेश है।

02

यह पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ 'हितोपदेश' नामक संस्कृत कथाग्रन्थ से लिया गया है। संस्कृत कथासाहित्य में हितोपदेश का विशिष्ट स्थान है क्योंकि यह कथाओं के माध्यम से जीवन से संबंधित उपदेश और प्रेरणा देता है।

03

वीरवर कौन था और वह राजा के पास क्यों आया था?

वीरवर एक कर्तव्यनिष्ठ राजपुत्र था। वह किसी अन्य देश से आजीविका (वृत्त्यर्थम्) प्राप्त करने के लिए अपनी पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर और पुत्री वीरवती के साथ राजा शूद्रक के राजद्वार पर आया था।

04

वीरवर ने अपनी 'सामग्री' के बारे में क्या कहा?

जब राजा ने 'का ते सामग्री?' (तुम्हारी योग्यता क्या है?) पूछा, तो वीरवर ने उत्तर दिया — 'इमौ बाहू, एष खड्गश्च' — अर्थात् ये दोनों भुजाएँ और यह तलवार।

05

वीरवर अपने वेतन का उपयोग कैसे करता था?

वीरवर प्रतिदिन राजदर्शन के बाद अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को अर्पण करता था। शेष बचे का आधा दरिद्रों को देता था, और जो बचता वह भोजन-व्यय के लिए पत्नी के हाथ में देता था।

06

राजलक्ष्मी कौन थीं और वे क्यों रो रही थीं?

राजलक्ष्मी राजा शूद्रक की राजसम्पदा (राजश्री) थीं। वे इसलिए रो रही थीं क्योंकि देवी के अपराध के कारण राजा शूद्रक तीसरे दिन मृत्यु को प्राप्त होगा, और तब वे अनाथ (स्वामी के बिना) हो जाएंगी।

07

राजा को बचाने का उपाय क्या था?

राजलक्ष्मी ने बताया कि यदि वीरवर अपनी सबसे प्रिय वस्तु को हँसते हुए मुख (सहासवदनेन) से भगवती सर्वमङ्गला को भेंट करे, तो राजा शूद्रक सौ वर्ष तक जीएगा और राजलक्ष्मी सुखपूर्वक वहाँ रहेंगी।

08

इस पाठ में 'वाक्यान्वयः' से क्या समझाया गया है?

पाठ में बताया गया है कि संस्कृत की एक विशेषता है — मुक्त पदक्रम। इसमें वाक्य के कर्ता, कर्म, क्रिया आदि शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। उदाहरण: 'रामः वनम् अगच्छत्', 'अगच्छत् रामः वनम्', 'वनम् अगच्छत् रामः' — तीनों सही हैं।

09

इस पाठ में भूतकाल के कौन-से रूप बताए गए हैं?

पाठ में भूतकाल के तीन रूप बताए गए हैं: (१) लङ्-लकार — जैसे उपागच्छत्, अनयत्; (२) लट्-लकार + 'स्म' — जैसे 'प्रतिवसति स्म'; (३) क्तवतु्-प्रत्यय — जैसे 'श्रुतवान्'; और क्त-प्रत्यय — जैसे 'निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता'।

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'अहर्निशम्' और 'पञ्चत्वम्' का अर्थ क्या है?

'अहर्निशम्' का अर्थ है दिन और रात (अहः = दिन, निशा = रात)। 'पञ्चत्वम्' का अर्थ है मृत्यु। राजलक्ष्मी ने बताया कि राजा 'पञ्चत्वं यास्यति' — अर्थात् मृत्यु को प्राप्त होगा।

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What happens in sannimitte varam tyagah class 8 Sanskrit Chapter 10?

इस पाठ में वीरवर नामक राजपुत्र राजा शूद्रक की सेवा में आता है। वह अपना वेतन देवताओं और दरिद्रों में बाँटकर रात-दिन सेवा करता है। एक रात राजलक्ष्मी से मिलने पर पता चलता है कि राजा की जान बचाने के लिए वीरवर को अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग करना होगा। पाठ का क-भाग यहीं समाप्त होता है।

12

जीमूतवाहन की कथा इस पाठ में क्यों दी गई है?

योग्यताविस्तरः के अंतर्गत जीमूतवाहन की कथा परोपकार और त्याग का आदर्श प्रस्तुत करने के लिए दी गई है। जीमूतवाहन ने नाग-पुत्र शङ्खचूड की जान बचाने के लिए गरुड के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया — यह वीरवर की कथा के त्याग-भाव से मिलता-जुलता है।

13

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