Summary
Parishishtam 3: Dhaturupani is a grammar reference appendix in Class 8 Sanskrit textbook Deepakam, providing complete verb conjugation tables for nine Sanskrit roots across five tenses and moods. यह परिशिष्ट परस्मैपद और आत्मनेपद — दोनों पक्षों में प्रमुख धातुओं के रूप एकवचन, द्विवचन और बहुवचन में प्रस्तुत करता है।
यह परिशिष्ट कक्षा ८ की संस्कृत पाठ्यपुस्तक 'दीपकम्' का व्याकरण-संदर्भ परिशिष्ट है। इसमें परस्मैपद की सात धातुओं — भू, गम्, पा, नी, स्था, दृश्, इष् — और आत्मनेपद की दो धातुओं — सेव् तथा लभ् — के रूप दिए गए हैं। प्रत्येक धातु के लट् (वर्तमानकाल), लृट् (भविष्यत्काल), लङ् (भूतकाल), लोट् (आज्ञार्थक) और विधिलिङ् (विध्यर्थक) — पाँच लकारों में प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन रूप दिए गए हैं।
Key points & formulas
- 01परस्मैपद में सात धातुओं के रूप दिए गए हैं: भू (होना), गम् (जाना), पा (पीना), नी (ले जाना), स्था (खड़े रहना/ठहरना), दृश् (देखना), इष् (चाहना)
- 02आत्मनेपद में दो धातुओं के रूप दिए गए हैं: सेव् (सेवा करना) और लभ् (पाना/प्राप्त करना)
- 03पाँच लकारों की तालिकाएँ: लट् (वर्तमान), लृट् (भविष्यत्), लङ् (भूत), लोट् (आज्ञा), विधिलिङ् (चाहिए/उचित है)
- 04प्रत्येक तालिका में तीन पुरुष (प्रथमपुरुषः, मध्यमपुरुषः, उत्तमपुरुषः) और तीन वचन (एकवचनम्, द्विवचनम्, बहुवचनम्) के रूप दिए गए हैं
- 05कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द-अर्थ: धातुः = क्रिया का मूल रूप; लकारः = काल या अर्थ; पुरुषः = person (प्रथम/मध्यम/उत्तम); वचनम् = number (एक/द्वि/बहु)
- 06लट् लकार के प्रमुख उदाहरण: भवति (वह होता है), गच्छति (वह जाता है), पश्यति (वह देखता है), इच्छति (वह चाहता है)
- 07यह परिशिष्ट संस्कृत में वाक्य बनाने और परीक्षा में धातुरूप लिखने के लिए एक तैयार संदर्भ-सारणी है
Frequently asked questions
01परिशिष्टम् ३ धातुरूपाणि में कौन-कौन सी धातुएँ दी गई हैं?
इस परिशिष्ट में परस्मैपद की सात धातुएँ — भू, गम्, पा, नी, स्था, दृश्, इष् — और आत्मनेपद की दो धातुएँ — सेव् और लभ् — के रूप दिए गए हैं। कुल नौ धातुओं की तालिकाएँ हैं।
02इस परिशिष्ट में कौन-कौन से लकार (काल) शामिल हैं?
परिशिष्ट में पाँच लकारों की तालिकाएँ दी गई हैं: लट्-लकार (वर्तमानकाल), लृट्-लकार (भविष्यत्काल), लङ्-लकार (भूतकाल), लोट्-लकार (आज्ञार्थक) और विधिलिङ्-लकार (विध्यर्थक)।
03लट्-लकार में 'भू' धातु के परस्मैपद रूप क्या हैं?
लट्-लकार (वर्तमानकाल) में भू धातु के रूप हैं — प्रथमपुरुष: भवति, भवतः, भवन्ति; मध्यमपुरुष: भवसि, भवथः, भवथ; उत्तमपुरुष: भवामि, भवावः, भवामः।
04परस्मैपद और आत्मनेपद में क्या अंतर है?
परस्मैपद और आत्मनेपद संस्कृत में धातुओं के दो पक्ष (voice) हैं। इनके प्रत्यय (endings) भिन्न होते हैं। इस परिशिष्ट में परस्मैपद की सात और आत्मनेपद की दो धातुओं की अलग-अलग तालिकाएँ दी गई हैं।
05लङ्-लकार में 'गम्' धातु के रूप क्या हैं?
लङ्-लकार (भूतकाल) में गम् धातु के रूप हैं — प्रथमपुरुष: अगच्छत्, अगच्छताम्, अगच्छन्; मध्यमपुरुष: अगच्छः, अगच्छतम्, अगच्छत; उत्तमपुरुष: अगच्छम्, अगच्छाव, अगच्छाम।
06लोट्-लकार किसे कहते हैं और इसका उपयोग कब होता है?
लोट्-लकार आज्ञार्थक होता है — इसका उपयोग आज्ञा, अनुरोध या प्रार्थना व्यक्त करने के लिए होता है। जैसे — भवतु (वह हो जाए), गच्छतु (वह जाए), पश्यतु (वह देखे)।
07विधिलिङ्-लकार का क्या अर्थ है?
विधिलिङ्-लकार विध्यर्थक होता है — इसका उपयोग 'चाहिए' या 'उचित है' अर्थ में होता है। जैसे — भवेत् (होना चाहिए), गच्छेत् (जाना चाहिए), पश्येत् (देखना चाहिए)।
08What are the dhatu (verb roots) given in Parishishtam 3 Dhaturupani of Class 8 Sanskrit Deepakam?
इस परिशिष्ट में नौ धातुएँ दी गई हैं: परस्मैपद में भू, गम्, पा, नी, स्था, दृश्, इष्; और आत्मनेपद में सेव् तथा लभ्।
09आत्मनेपद में 'सेव्' धातु के वर्तमानकाल के रूप क्या हैं?
लट्-लकार (वर्तमानकाल) में सेव् धातु के आत्मनेपद रूप हैं — प्रथमपुरुष: सेवते, सेवेते, सेवन्ते; मध्यमपुरुष: सेवसे, सेवेथे, सेवध्वे; उत्तमपुरुष: सेवे, सेवावहे, सेवामहे।
10'दृश्' धातु का वर्तमानकाल रूप क्या है और इसका अर्थ क्या है?
दृश् धातु का अर्थ है 'देखना'। लट्-लकार में इसके रूप हैं — प्रथमपुरुष: पश्यति, पश्यतः, पश्यन्ति; मध्यमपुरुष: पश्यसि, पश्यथः, पश्यथ; उत्तमपुरुष: पश्यामि, पश्यावः, पश्यामः।
11'इष्' धातु का अर्थ क्या है और इसके लट्-लकार के रूप क्या हैं?
इष् धातु का अर्थ है 'चाहना'। लट्-लकार में इसके रूप हैं — प्रथमपुरुष: इच्छति, इच्छतः, इच्छन्ति; मध्यमपुरुष: इच्छसि, इच्छथः, इच्छथ; उत्तमपुरुष: इच्छामि, इच्छावः, इच्छामः।
12'स्था' धातु का भविष्यत्काल रूप क्या है?
लृट्-लकार (भविष्यत्काल) में स्था धातु के रूप हैं — प्रथमपुरुष: स्थास्यति, स्थास्यतः, स्थास्यन्ति; मध्यमपुरुष: स्थास्यसि, स्थास्यथः, स्थास्यथ; उत्तमपुरुष: स्थास्यामि, स्थास्यावः, स्थास्यामः।
13'लभ्' धातु का अर्थ क्या है और इसके भूतकाल के रूप क्या हैं?
लभ् धातु का अर्थ है 'पाना' या 'प्राप्त करना'। लङ्-लकार (भूतकाल, आत्मनेपद) में इसके रूप हैं — प्रथमपुरुष: अलभत, अलभेताम्, अलभन्त; मध्यमपुरुष: अलभथाः, अलभेथाम्, अलभध्वम्; उत्तमपुरुष: अलभे, अलभावहि, अलभामहि।
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