Class 11 Sanskrit

Chapter 2 — Paropakaraya Satam Vibhutayah

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Overview

Summary

NCERT Class 11 Sanskrit Shashwati Paropakaraya Satam Vibhutayah — यह शाश्वती पाठ्यपुस्तक का द्वितीय पाठ है, जो आर्यशूर-रचित जातकमाला ग्रन्थ के पन्द्रहवें जातक 'मत्स्यजातकम्' का गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में संक्षेप है।

एक सुंदर सरोवर में मत्स्याधिपति के रूप में जन्मे बोधिसत्त्व बहुजन्मों के परोपकार-अभ्यास के कारण मछलियों का परम अनुग्रह करते थे। वर्षा न होने से सरोवर सूखकर लघुपल्वल के समान हो गया और मछलियाँ मृतप्राय हो गईं। शत्रु पक्षी उन्हें खाने की चिंता करने लगे। बोधिसत्त्व ने करुणावश सत्यवाक्य उच्चारित किया — उन्होंने कभी प्राणिवध नहीं किया। इस सत्यतपोबल से अकाल में भी कालमेघ प्रकट हुए, वर्षा हुई और सरोवर भर गया। देवराज इन्द्र (शक्र) स्वयं आकर उनकी सत्यशक्ति की प्रशंसा की। पाठ का निष्कर्ष है कि शीलवानों के कल्याणकारी मनोरथ इस लोक और परलोक में वृद्धि पाते हैं।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01पाठ का स्रोत: आर्यशूर-रचित 'जातकमाला' ग्रन्थ का पन्द्रहवाँ जातक 'मत्स्यजातकम्'; विधा — गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत।
  2. 02मूल जातक कथाएँ पालि भाषा में हैं (संख्या 547); जातकमाला उन्हीं से प्रेरणा लेकर आर्यशूर की रचना है।
  3. 03केंद्रीय भाव: सत्य-तपोबल के आधार पर बोधिसत्त्व ने मत्स्याधिपति के रूप में साथी मत्स्यों की प्राण रक्षा की; सत्त्वगुण से परिपूर्ण आचरण देवताओं को भी वश में कर सकता है।
  4. 04मुख्य पात्र: बोधिसत्त्व (मत्स्याधिपति), देवराज इन्द्र (शक्र)। घटना-क्रम: वर्षाहीनता → सरोवर का सूखना → मत्स्यों का संकट → सत्यवाक्य → अकाल में वर्षा → इन्द्र का साक्षात् आगमन।
  5. 05प्रमुख श्लोक (योग्यताविस्तारः, पाठ की शीर्षक-पंक्ति का स्रोत): 'पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः / स्वयं न खादन्ति फलन्ति वृक्षाः। / धाराधरो वर्षति नात्महेतोः / परोपकाराय सतां विभूतयः ॥' — भावार्थ: नदियाँ, वृक्ष और बादल स्वयं के लिए नहीं, दूसरों के उपकार के लिए होते हैं — सज्जनों की विभूतियाँ परोपकार के लिए ही होती हैं।
  6. 06मुख्य पाठ-श्लोक (बोधिसत्त्व का चिंतन): 'प्रत्यहं क्षीयते तोयं स्पर्धमानमिवायुषा। / अद्यापि च चिरेणैव लक्ष्यते जलदागमः॥' — भावार्थ: जल प्रतिदिन आयु से स्पर्धा करता हुआ घट रहा है और बादलों का आगमन भी देर से दिखाई देता है।
  7. 07कठिन शब्दार्थ: कुवलयम् = नीला कमल (नीलकमल); बत = हाय! (शोकसूचक अव्यय पद); परत्र = परलोक में।
  8. 08पाठ का उपदेश (स्रोत से): 'शीलवताम् इह एव कल्याणाः अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति प्रागेव परत्र च। अतः शीलविशुद्धौ प्रयतितव्यम्।' — शीलवानों के शुभ मनोरथ इस लोक और परलोक दोनों में फलते हैं।
Questions

Frequently asked questions

01

Paropakaraya Satam Vibhutayah पाठ किस ग्रन्थ से लिया गया है?

यह पाठ आर्यशूर-रचित 'जातकमाला' ग्रन्थ के पन्द्रहवें जातक 'मत्स्यजातकम्' का संक्षेप है।

02

जातकमाला के लेखक कौन हैं?

जातकमाला के लेखक आर्यशूर हैं। यह गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में लिखा गया ग्रन्थ है।

03

मूल जातक कथाएँ किस भाषा में हैं और उनकी संख्या कितनी है?

मूल जातक कथाएँ पालि भाषा में हैं और उनकी संख्या 547 है।

04

इस पाठ में बोधिसत्त्व किस रूप में प्रकट हुए हैं?

इस पाठ में बोधिसत्त्व मत्स्याधिपति (मछलियों के राजा) के रूप में एक सुंदर, कमल-कुवलय-विभूषित सरोवर में जन्मे हैं।

05

सरोवर के सूखने का क्या कारण था?

प्राणियों के भाग्यवैकल्यात् और प्रमाद के कारण वर्षा नहीं हुई, जिससे सरोवर धीरे-धीरे सूखकर छोटे तालाब (लघुपल्वल) के समान हो गया।

06

बोधिसत्त्व ने मछलियों की रक्षा कैसे की?

बोधिसत्त्व ने आकाश की ओर देखकर अपना सत्यतपोबल प्रयोग किया — उन्होंने कभी प्राणिवध नहीं किया, इस सत्य के आधार पर देवराज से वर्षा की प्रार्थना की। इससे अकाल में भी कालमेघ प्रकट हुए और वर्षा हुई।

07

देवराज इन्द्र ने पाठ में क्या किया?

देवराज इन्द्र (शक्र) परम विस्मित हो गए और स्वयं बोधिसत्त्व के पास आकर, प्रशंसा करते हुए बोले कि यह उनकी सत्यशक्ति का अलौकिक प्रभाव है जो बादल उलटे घड़ों के समान बरस रहे हैं। प्रियवचन कहकर वे अन्तर्धान हो गए।

08

इस पाठ का केंद्रीय भाव क्या है?

पाठ का केंद्रीय भाव यह है कि सत्य-तपोबल के आधार पर बोधिसत्त्व ने मत्स्याधिपति के रूप में अपने साथी मत्स्यों की प्राण रक्षा की। सत्त्वगुण से परिपूर्ण आचरण देवताओं को भी वश में कर सकता है।

09

'परोपकाराय सतां विभूतयः' का अर्थ क्या है?

पाठ के योग्यताविस्तारः में संकलित श्लोक के अनुसार — नदियाँ स्वयं जल नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बादल स्वयं के लिए वर्षा नहीं करते — अर्थात् सज्जनों (सतां) की समस्त विभूतियाँ (शक्तियाँ/ऐश्वर्य) परोपकार के लिए ही होती हैं।

10

पाठ का नैतिक उपदेश क्या है?

पाठ का उपदेश है: 'शीलवताम् इह एव कल्याणाः अभिप्रायाः वृद्धिम् आप्नुवन्ति प्रागेव परत्र च। अतः शीलविशुद्धौ प्रयतितव्यम्' — शीलवानों के शुभ मनोरथ इस लोक और परलोक दोनों में फलते हैं, इसलिए शील-शुद्धि में प्रयत्न करना चाहिए।

11

इस पाठ की भाषा-शैली क्या है?

यह पाठ गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में रचित है।

12

Class 11 Sanskrit Shashwati chapter 2 में बोधिसत्त्व का स्वभाव कैसा वर्णित है?

बोधिसत्त्व बहुजन्मों के परोपकार-अभ्यास के कारण उस जन्म में मत्स्याधिपति होते हुए भी परहितसुखसाधन में सदा व्यापृत रहते थे। वे मछलियों पर उसी प्रकार स्नेह करते थे जैसे अपने प्रिय अपत्यों पर।

13

क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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