Summary
'Nahin Hona Beemar' Class 7 Hindi (Malhar) ka ek hasya-kahaani hai jise Swayam Prakash ne likha hai — ek bachche ki vah katha jo beemar padne ka natak karta hai aur pura din bhooka-akela reh kar seekhta hai ki jhooth ka fal kadi saza hoti hai.
एक बच्चा नानीजी के साथ बीमार पड़ोसी सुधाकर काका को अस्पताल में देखने जाता है। वहाँ साफ-सुथरे बिस्तर पर आराम करते और साबूदाने की खीर खाते काका को देख उसे लगता है — 'क्या ठाठ हैं बीमारों के!' कुछ दिन बाद जब होमवर्क नहीं होता, तो वह बीमारी का नाटक करता है। नानाजी कड़वी पुड़िया और काढ़ा देते हैं, खाना बिल्कुल बंद कर देते हैं। दिनभर बोरियत, भूख और घर से बाहर न जा पाने की तड़प झेलने के बाद बच्चा समझ जाता है कि स्कूल जाना ही बेहतर था। उसके बाद उसने कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाया।
Key points & formulas
- 01लेखक: स्वयं प्रकाश (1947–2019) — हिंदी के जाने-माने कहानीकार, बच्चों और बड़ों दोनों के लिए रोचक कहानियाँ लिखते थे।
- 02विधा: हास्य कहानी (बाल-कहानी), प्रथम पुरुष शैली में लिखी गई।
- 03केंद्रीय भाव: झूठ और बहाने का परिणाम दुखद होता है; असली बीमारी और कल्पना की बीमारी में ज़मीन-आसमान का फ़र्क होता है।
- 04मुख्य पात्र: कहानी का बच्चा (कथावाचक), नानीजी, नानाजी, सुधाकर काका, मुन्नू।
- 05शब्दार्थ — साबूदाना: सागू वृक्ष के तने के गूदे से बना दाना, जो उपवास और बीमारी में खिलाया जाता है।
- 06शब्दार्थ — काढ़ा: जड़ी-बूटियों और औषधियों को उबालकर बनाया गया पेय, सर्दी-बुखार में लाभकारी माना जाता है।
- 07शब्दार्थ — रजाई: रुई भरा दोहरे कपड़े का जाड़े का ओढ़ना; बच्चा पूरे दिन इसी में छुपा रहा।
Frequently asked questions
01Nahin Hona Beemar का सारांश क्या है?
एक बच्चा अस्पताल में बीमार काका को आराम से साबूदाने की खीर खाते देख सोचता है कि बीमार रहना बड़े मजे का है। होमवर्क न होने पर वह खुद बीमारी का नाटक करता है। नानाजी-नानीजी कड़वी दवा देते हैं और खाना बंद कर देते हैं। दिनभर भूखा-बोर रहने के बाद बच्चा सीखता है कि बहाने का नतीजा स्कूल से भी बुरा होता है।
02Nahin Hona Beemar के लेखक कौन हैं?
इस कहानी के लेखक स्वयं प्रकाश (1947–2019) हैं। वे हिंदी के जाने-माने कहानीकार थे। उनकी कहानियाँ बच्चों और बड़ों दोनों के दिलों को छू जाती हैं।
03Nahin Hona Beemar का केंद्रीय भाव क्या है?
कहानी का केंद्रीय भाव यह है कि झूठ और बहाने का परिणाम सदा कठिन होता है। बच्चे की कल्पना में बीमारी आराम और खीर का जरिया लगती थी, पर असल में दिनभर भूखे-बोर रहना पड़ा। इसीलिए उसने फिर कभी बीमारी का नाटक नहीं किया।
04बच्चे ने बीमारी का नाटक क्यों किया?
बच्चे ने होमवर्क नहीं किया था और स्कूल जाने का मन नहीं था। उसे डर था कि स्कूल जाने पर सजा मिलेगी। इसलिए उसने बीमार होने का बहाना बनाकर घर में रहने का फैसला किया।
05'क्या ठाठ हैं बीमारों के!' — बच्चे के मन में यह भाव क्यों आया?
अस्पताल में सुधाकर काका को साफ-सुथरे बिस्तर पर आराम से लेटे और नानीजी के हाथ से साबूदाने की खीर खाते देखकर बच्चे को लगा कि बीमार रहना बड़े आराम का काम है। इसी से उसके मन में यह विचार आया।
06नानाजी ने बच्चे को बीमार होने पर क्या दिया?
नानाजी ने बच्चे को कड़वी पुड़िया (दवा) खिलाई और काढ़े जैसी चाय पिलाई। साथ ही नानीजी को कह दिया कि आज इसे कुछ खाने को मत देना — यानी पूरे दिन बच्चे को भूखा रहना पड़ा।
07काढ़ा क्या होता है?
काढ़ा कई तरह की जड़ी-बूटियों और औषधियों को उबालकर बनाया गया पेय होता है। इसे सर्दी-जुकाम, खाँसी-बुखार और पाचन की समस्याओं में लाभदायक माना जाता है।
08साबूदाना किसे कहते हैं?
साबूदाना सागू नामक वृक्ष के तने का गूदा होता है। पहले यह आटे के रूप में होता है और फिर कूटकर दानों के रूप में सुखाया जाता है। इसे उपवास और बीमारी में खाया जाता है।
09बच्चा दिनभर रजाई में पड़े-पड़े क्या सोचता रहा?
बच्चा घर के सदस्यों की गतिविधियों का अनुमान लगाता रहा — छोटे मामा का नहाकर निकलना, मुन्नू का जूता ढूँढ़ना, कुसुम मौसी का कॉलेज बस पकड़ना। साथ ही उसे गली की चहल-पहल देखने की तड़प, स्कूल में नमक-मिर्च वाले अमरूद की याद और खाने की जोरदार इच्छा भी होती रही।
10मुन्नू को आम खाते देखकर बच्चे को कैसा लगा?
बच्चा चुपके से दरवाजे से झाँककर देखता है कि सब दाल-चावल और तली हरी मिर्च खा रहे हैं और मुन्नू आम चूस रहा है। यह देखकर बच्चे को जलन, गुस्से और कुढ़न हुई और वह पाँव पटकता वापस बिस्तर में आ गया।
11कहानी के अंत में बच्चे ने क्या निर्णय किया?
पूरे दिन भूखे, बोर और अकेले रहने के बाद बच्चे को समझ आ गया कि स्कूल जाना ही बेहतर था। उसने मन में तय किया कि इसके बाद स्कूल से छुट्टी मारने के लिए वह कभी बीमारी का बहाना नहीं बनाएगा।
12Nahin Hona Beemar summary in hindi
यह स्वयं प्रकाश की हास्य कहानी है। एक बच्चा बीमार काका को आराम से खीर खाते देख सोचता है कि बीमार रहना मजेदार है। होमवर्क न होने पर वह खुद बीमारी का बहाना बनाता है। नानाजी कड़वी दवा देते हैं, खाना बंद करते हैं। दिनभर भूखा-बोर रहने के बाद बच्चा सीखता है कि झूठ का परिणाम दुखद होता है और वह फिर कभी ऐसा बहाना नहीं बनाता।
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