Class 12 Sanskrit

Chapter 7 — Vikramasyaudaryam

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Overview

Summary

NCERT Class 12 Sanskrit Shaswati Vikramasyaudaryam यह पाठ 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' ग्रंथ से उद्धृत है, जिसमें राजा विक्रमादित्य की अपार उदारता (औदार्य) का वर्णन है — उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' में सम्पूर्ण राजकोष और समुद्र से प्राप्त चार दिव्य रत्न भी एक ब्राह्मण को दान कर दिए।

यह पाठ 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' से लिया गया है, जिसमें राजा भोज को सिंहासन की पुत्तलिका विक्रमादित्य की उदारता की कथा सुनाती है। विक्रम को संसार असार लगा, इसलिए उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' किया। उन्होंने एक ब्राह्मण को समुद्र को आमंत्रित करने भेजा। समुद्र ब्राह्मण रूप में आया और चार दिव्य रत्न भेजे। यज्ञ की दक्षिणा में सब कुछ दान करने के बाद राजा ने उन चारों रत्नों को भी उसी ब्राह्मण को दे दिया, क्योंकि ब्राह्मण का परिवार किसी एक रत्न पर सहमत न हो सका।

Essentials

Key points & formulas

  1. 01पाठ का स्रोत एवं विधा: 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' — राजा भोज को सुनाई गई 32 मनोरंजक कथाओं का संग्रह; इस ग्रंथ में गद्यमय, पद्यमय और गद्य-पद्यमय तीन प्रकार के पाठ हैं। ग्रंथ का समय राजा भोज (1018–1063) के पश्चात् माना जाता है। प्रस्तुत पाठ गद्य-पद्यमय विधा का है।
  2. 02केंद्रीय भाव: राजा विक्रमादित्य का 'औदार्य' (उदारता); उन्हें संसार असार प्रतीत हुआ और उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' के माध्यम से सम्पूर्ण राजकोष दान किया।
  3. 03मुख्य पात्र एवं घटनाएँ: विक्रमादित्य, राजा भोज, सिंहासन की पुत्तलिका, ब्राह्मण दूत और समुद्र (ब्राह्मण रूप धारण करके)। यज्ञ के लिए देव, मुनि, गंधर्व, यक्ष, सिद्धादि सभी को आमंत्रित किया गया।
  4. 04समुद्र के चार रत्न: प्रथम से इच्छित वस्तु मिलती है, द्वितीय से अमृत-तुल्य भोजन उत्पन्न होता है, तृतीय से चतुरङ्गबल (घुड़सवार, रथसवार, हाथीसवार और पैदल सैनिकों की सेना) मिलती है, चतुर्थ से दिव्य आभूषण प्राप्त होते हैं।
  5. 05प्रमुख श्लोक (verbatim): 'उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥' — भावार्थ: कमाए हुए धन की रक्षा उसके त्याग (दान) में है, जैसे तालाब की गहराई में स्थित जल की रक्षा उसके निकास (परीवाह) से होती है।
  6. 06षड्विध प्रीतिलक्षण: स्रोत में समुद्र के कथन में वर्णित है कि देना, लेना, गोपनीय बात बताना, पूछना, स्वयं खाना और दूसरे को खिलाना — ये छह मित्रता के लक्षण हैं।
  7. 07कठिन शब्दार्थ: 'पुत्तलिका' = पुतली (सिंहासन में बनी मूर्ति); 'सर्वस्वदक्षिणम्' = वह यज्ञ जिसमें सर्वस्व दक्षिणा दे दी जाए; 'चतुरङ्गबलम्' = चार अंगों वाली सेना (घुड़सवार, रथसवार, हाथीसवार, पैदल); 'स्नुषा' = पुत्रवधू।
Questions

Frequently asked questions

01

विक्रमस्यौदार्यम् पाठ किस ग्रंथ से लिया गया है?

'सिंहासनद्वात्रिंशिका' से — यह राजा भोज को सुनाई गई 32 मनोरंजक कथाओं का संग्रह है। इसका समय राजा भोज (1018–1063) के पश्चात् माना जाता है।

02

Vikramasyaudaryam path ka kendra kya hai?

राजा विक्रमादित्य का 'औदार्य' (उदारता) इस पाठ का केंद्रीय भाव है। उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' में सारी संपत्ति और समुद्र से प्राप्त चार रत्न भी दान में दे दिए।

03

सर्वस्वदक्षिणयज्ञ क्या होता है?

वह यज्ञ जिसमें 'सर्वस्व' अर्थात् सम्पूर्ण संपत्ति दक्षिणा के रूप में दे दी जाती है। राजा विक्रम ने संसार को असार समझकर यही यज्ञ किया।

04

समुद्र ने ब्राह्मण को कितने रत्न दिए और उनके क्या गुण थे?

समुद्र ने ब्राह्मण रूप में आकर चार रत्न भेजे — पहले से इच्छित वस्तु, दूसरे से अमृत-तुल्य भोजन, तीसरे से चतुरङ्गबल (सेना), चौथे से दिव्य आभूषण।

05

ब्राह्मण के परिवार में किस बात पर विवाद हुआ?

ब्राह्मण के पुत्र, पिता, पत्नी और पुत्रवधू में से प्रत्येक अलग-अलग रत्न चाहता था। पुत्र सेना-बल वाला, पिता धन देने वाला, पत्नी भोजन वाला और पुत्रवधू आभूषण वाला रत्न चाहती थी।

06

राजा विक्रम ने चारों रत्न किसे और क्यों दिए?

राजा ने चारों रत्न उस ब्राह्मण को दे दिए जो समुद्र से संदेश लेकर आया था, क्योंकि ब्राह्मण का परिवार किसी एक रत्न पर सहमत नहीं हो सका।

07

पुत्तलिका ने राजा भोज से क्या कहा?

पुत्तलिका ने कहा कि इस सिंहासन पर केवल वही बैठ सकता है जिसमें विक्रम के समान सहज औदार्य (उदारता) हो।

08

Vikramasyaudaryam mein dhan ke tyag par kaunsa shlok hai?

स्रोत में यह श्लोक है: 'उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥' — अर्थात् कमाए धन की रक्षा उसके त्याग (दान) में है, जैसे तालाब के जल की रक्षा उसके निकास में।

09

षड्विध प्रीतिलक्षण किसे कहते हैं?

स्रोत में समुद्र के कथन के अनुसार, देना, लेना, गोपनीय बात बताना, पूछना, खुद खाना और खिलाना — ये छह मित्रता (प्रीति) के लक्षण हैं।

10

राजा विक्रम ने संसार को असार क्यों माना?

स्रोत के अनुसार विक्रम ने सोचा कि यह संसार अनिश्चित है, किसी को कब क्या होगा पता नहीं; और कमाया धन दान व उपभोग के बिना सफल नहीं होता।

11

NCERT Class 12 Sanskrit Shaswati Chapter 7 ka saransh Hindi mein

इस अध्याय में विक्रमादित्य की उदारता का वर्णन है। उन्होंने 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' किया, समुद्र से प्राप्त चार दिव्य रत्न भी ब्राह्मण को दान दे दिए। पुत्तलिका यह कथा राजा भोज को सिंहासन पर बैठने से पहले सुनाती है।

12

क्या इस पाठ का PDF मुफ़्त डाउनलोड कर सकते हैं?

हाँ, यह मुफ़्त है, बिना साइन-अप।

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